लेखनी : डॉ. विनीता राजपूत
खैरागढ़. भारत विविधताओं का देश है। यहां अलग-अलग भाषाएं, लोकपरंपराएं, संस्कृतियां और पर्व-त्योहार अपनी विशिष्ट पहचान के साथ सदियों से फलते-फूलते आए हैं। अनेकता में एकता की यही भावना भारतीय संस्कृति को एक मजबूत धागे में पिरोती है। इसी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत में छत्तीसगढ़ के लोकपर्वों का अपना विशेष स्थान है। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति में हरेली को पहला लोकपर्व माना जाता है। यह केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, हरियाली, कृषि, पशुधन और लोकजीवन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की सदियों पुरानी परंपरा है।
हरेली का पर्व छत्तीसगढ़ में श्रावण मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मनाया जाता है। इसका सीधा संबंध कृषि और किसान जीवन से है। हरेली अर्थात धरती का प्रकृति की हरी चुनरी ओढ़कर दुल्हन की तरह सज जाना। वर्षा ऋतु में जब खेत-खलिहान हरियाली से भर उठते हैं और धरती नई फसल की उम्मीद से मुस्कुराने लगती है, तब किसान इस पर्व के माध्यम से प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा और आभार प्रकट करता है।
कृषि कार्य पूरा होने के बाद उत्सव की शुरुआत
किसान धान की बुवाई, रोपाई और बियासी जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्यों को पूरा करने के बाद हरेली का पर्व मनाते हैं। इसलिए इसे कृषक वर्ग की सुख-समृद्धि का पर्व भी कहा जाता है। खेती-किसानी से जुड़े इस त्योहार में किसान अपने श्रम, भूमि और प्रकृति के बीच स्थापित संबंध को सम्मान देता है।
हरेली सदियों से चली आ रही परंपराओं, रीति-रिवाजों और लोकअनुष्ठानों को जीवंत बनाए रखने का माध्यम है। यह छत्तीसगढ़ की संस्कृति की अभिव्यक्ति और पहचान भी है। वास्तव में यह पर्व जीवन और जमीन, मनुष्य और प्रकृति के बीच सुख एवं समृद्धि के गहरे संबंध को रेखांकित करता है।
गोधन से लेकर कृषि औजारों तक की पूजा
हरेली के दिन कृषक अपने गोधन को नहला-धुलाकर साफ-सुथरा करते हैं और उन्हें सुसज्जित करते हैं। खेती में उपयोग आने वाले औजारों—हल (नागर), कुदाली, फावड़ा, गैंती, हंसिया आदि को भी धोकर साफ किया जाता है। घर के आंगन में मूरम का सुंदर बिछौना तैयार कर इन कृषि उपकरणों को सुसज्जित किया जाता है और विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवसर पर कुल देवता की भी पूजा की जाती है।
इस परंपरा में किसान उन साधनों के प्रति भी कृतज्ञता व्यक्त करता है, जो वर्षभर उसके जीवन और आजीविका का आधार बने रहते हैं।
चीला-नारियल के प्रसाद से महकते हैं घर
हरेली के अवसर पर घरों में विशेष पकवान बनाए जाते हैं। चीला और नारियल का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसके अलावा पूरी और अन्य पारंपरिक व्यंजन भी बनाए जाते हैं। पूरा परिवार इस उत्सव में शामिल होता है और लोकपरंपराओं के बीच पर्व की खुशियां साझा करता है।
गेड़ी पर चढ़कर बच्चों की मस्ती
हरेली की सबसे आकर्षक लोकपरंपराओं में गेड़ी चढ़ना प्रमुख है। बच्चे बांस से बनी गेड़ी पर चढ़कर खेलते हैं। गेड़ी को लेकर मान्यता है कि पुराने समय में बरसात के दिनों में गांवों के रास्ते कीचड़ से भर जाते थे और लोगों का पैदल चलना मुश्किल होता था। ऐसे में बांस की गेड़ी बनाकर उस पर चढ़कर कीचड़ भरे रास्तों को पार किया जाता था। धीरे-धीरे यही उपयोगी साधन हरेली की लोकपरंपरा और बच्चों के मनोरंजन का हिस्सा बन गया।
नीम की डाल और चौखट पर कील की परंपरा
हरेली के दिन यादव और लोहार समुदाय की भी विशेष भूमिका होती है। यादव समाज के लोग नीम की डालियां तोड़कर घर-घर के दरवाजों पर लगाते हैं। नीम को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता है। लोकमान्यता के अनुसार नीम बीमारियों से बचाव के साथ-साथ कीट-पतंगों को दूर रखने में भी सहायक होता है।
वहीं लोहार समुदाय के लोग घर-घर जाकर दरवाजों की चौखट पर कील ठोकने की परंपरा निभाते हैं। लोकविश्वास है कि लोहार द्वारा चौखट पर कील ठोकना आशीर्वाद देने के समान है और इससे घर में रहने वाले लोगों की अनिष्ट से रक्षा होती है।
हरेली देव के भित्तिचित्र से बलाई दूर करने की मान्यता
हरेली के दिन घरों के दरवाजों पर गाय के गोबर से हरेली देव का चित्र अथवा भित्तिचित्र बनाने की परंपरा भी है। लोकमान्यता है कि इससे बलाई दूर होती है और घर-परिवार को बुरी नजर से सुरक्षा मिलती है। यह परंपरा ग्रामीण जीवन में प्रकृति, पशुधन और लोकआस्था के आपसी संबंध को भी दर्शाती है।
खेल-कूद और लोकगीतों में जीवंत होती परंपरा
हरेली केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। इस अवसर पर गांवों में नारियल फेंकने की प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं। महिलाएं खो-खो और फुगड़ी जैसे पारंपरिक खेलों में उत्साहपूर्वक भाग लेती हैं।
फुगड़ी से पहले पारंपरिक छत्तीसगढ़ी लोकगीत ‘गोबर दे बछरू, गोबर दे’ गाया जाता है और इसके बाद फुगड़ी खेली जाती है। यह केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन में शारीरिक गतिविधि और सामूहिक सहभागिता का भी उदाहरण है। फुगड़ी के दौरान शरीर के विभिन्न अंगों की गतिविधि होती है, जिससे इसे व्यायाम और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी उपयोगी माना जाता है।
लोकसंस्कृति और प्रकृति के रिश्ते का उत्सव
हरेली की हर परंपरा अपने भीतर कोई न कोई लोकज्ञान, सामाजिक संदेश या प्रकृति से जुड़ा भाव समेटे हुए है। कृषि औजारों की पूजा किसान के श्रम का सम्मान है, गोधन की पूजा पशुधन के महत्व को दर्शाती है, नीम की डाल प्रकृति और स्वास्थ्य से जुड़ी लोकमान्यता को सामने रखती है तो गेड़ी और पारंपरिक खेल ग्रामीण जीवन की सहजता और सामूहिकता का प्रतीक हैं।
इस तरह हरेली केवल एक दिन मनाया जाने वाला पर्व नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकआस्था, कृषि संस्कृति, प्रकृति प्रेम और सामुदायिक जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। हरियाली से सजी धरती के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व किसान के चेहरे पर नई उम्मीद और परिवारों में सुख-समृद्धि की कामना लेकर आता है।
हरेली वास्तव में छत्तीसगढ़ के कृषक समाज का वह पर्व है, जिसमें धरती को मां, प्रकृति को जीवनदाता और कृषि को समृद्धि का आधार मानते हुए कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और लोकजीवन में उतनी ही गहराई से रचा-बसा है, जितना सदियों पहले था।


