खैरागढ़. खरीफ सीजन 2026-27 में किसानों को समय पर खाद और बीज उपलब्ध कराने के लिए जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग ने व्यापक व्यवस्था की है। कलेक्टर इंद्रजीत सिंह चंद्रवाल के निर्देश पर जिले के दूरस्थ और अंतिम छोर के गांवों तक भी उर्वरक पहुंचाया जा रहा है। इसके चलते किसानों को अब खाद लेने के लिए लंबी दूरी तय नहीं करनी पड़ रही है।

जिले की 65 सेवा सहकारी समितियों में अब तक 18,138.62 मीट्रिक टन रासायनिक खाद का भंडारण किया गया है, जबकि 12,204.14 मीट्रिक टन खाद का वितरण किसानों को किया जा चुका है। वहीं 4,740.60 क्विंटल धान बीज का भंडारण और 3,433 क्विंटल बीज का वितरण भी हो चुका है। इस वर्ष 26 नई सहकारी समितियों के गठन के बाद जिले में कुल समितियों की संख्या 65 हो गई है।
भावे के किसानों को मिली बड़ी राहत
कुछ दिनों पहले ग्राम भावे और आसपास के ग्रामीणों ने कलेक्टर से मिलकर खाद वितरण की समस्या बताई थी। किसानों ने कहा था कि उन्हें उर्वरक लेने के लिए लगभग 40 किलोमीटर दूर भोथली समिति तक जाना पड़ता है। मामले को गंभीरता से लेते हुए प्रशासन ने गांव स्तर पर खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था की।

इसके तहत ग्राम पंचायत भावे के आश्रित गांव भावे, जुरलाखार, थोर्राडीह और कौहाबहारा के किसानों को गांव में ही खाद उपलब्ध कराई गई। भोथली समिति के माध्यम से 12 किसानों को 42 बोरी यूरिया, 14 बोरी इफको खाद और 7 बोरी पोटाश वितरित किया गया। किसानों ने इसे प्रशासन की किसान हितैषी पहल बताते हुए स्वागत किया।
नई समितियों से बढ़ी सुविधा
नवीन सेवा सहकारी समिति भुरभूसी, पथार्रा और संबलपुर में भी खाद वितरण शुरू हो गया है। इससे किसानों को अपने गांवों के नजदीक ही कृषि आदान सामग्री मिल रही है और परिवहन खर्च में कमी आई है।
43 हजार मीट्रिक टन खाद वितरण का लक्ष्य
कृषि विभाग के उपसंचालक राजकुमार सोलंकी ने बताया कि खरीफ सीजन 2026-27 के लिए जिले को निजी एवं सहकारी क्षेत्र मिलाकर 43 हजार मीट्रिक टन खाद वितरण का लक्ष्य मिला है। इनमें केवल सहकारी समितियों के माध्यम से 29,500 मीट्रिक टन खाद वितरण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

उन्होंने बताया कि वर्तमान में सहकारी समितियों में करीब 18 हजार मीट्रिक टन खाद का भंडारण किया जा चुका है। किसानों के लिए यूरिया, एनपीके, डीएपी, सिंगल सुपर फॉस्फेट, सुपर फॉस्फेट और पोटाश सहित विभिन्न प्रकार के उर्वरक उपलब्ध हैं।
राजकुमार सोलंकी ने कहा कि इस वर्ष अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून सामान्य से कमजोर रहने की संभावना जताई जा रही है। ऐसे में किसानों को परंपरागत रोपा पद्धति और अत्यधिक छिड़काव आधारित खेती पर निर्भर रहने के बजाय ओनारी पद्धति से धान की बुवाई करने की सलाह दी जा रही है।

उनके अनुसार ओनारी पद्धति में धान की जड़ें मिट्टी की गहराई तक विकसित होती हैं, जिससे पौधों में सूखे की स्थिति को सहन करने की क्षमता बढ़ती है और कम वर्षा की स्थिति में भी फसल अपेक्षाकृत सुरक्षित रहती है।
जिला प्रशासन का कहना है कि खरीफ सीजन के दौरान किसानों को समय पर खाद-बीज उपलब्ध कराने और वितरण व्यवस्था की सतत निगरानी के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं।


