खैरागढ़. नगर के किल्लापारा स्थित श्री गोपीनाथ मंदिर परिसर में स्वर्गीय भावना श्रीवास्तव की प्रथम पुण्यतिथि की पावन स्मृति में 18 मई से 25 मई तक आयोजित सात दिवसीय शिवमहापुराण कथा श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के बीच सम्पन्न हो गई। समापन अवसर पर विधि-विधान से हवन पूजन, शिव रुद्राभिषेक एवं महाप्रसादी वितरण का आयोजन किया गया। सात दिनों तक पूरा खैरागढ़ शिवभक्ति में डूबा नजर आया और मंदिर परिसर “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंजता रहा।
18 मई को भव्य कलश यात्रा के साथ शुरू हुए इस धार्मिक आयोजन में प्रतिदिन शाम 4 बजे से 7 बजे तक महाशिवपुराण कथा का आयोजन किया गया। खैरागढ़ नगर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण करने पहुंचे। कथा स्थल पर प्रतिदिन श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती रही। विधायक यशोदा नीलांबर वर्मा, जिला पंचायत उपाध्यक्ष विक्रांत सिंह, घम्मन साहू, नीलांबर वर्मा, दिनेश वर्मा, सरस्वती यदु, गोरेलाल वर्मा, डॉ अरुण भारद्वाज, आयश सिंह, आलोक श्रीवास, दीपक देवांगन, रूपेंद्र रजक, सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं नेताओं ने भी कथा स्थल पहुंचकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की और क्षेत्र की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली की कामना की।
कथावाचक पंडित रूपेश कृष्ण मिश्रा ने अपनी ओजस्वी वाणी, प्रभावशाली शैली और सुमधुर भजनों से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। उनके भजनों पर श्रद्धालु झूमते नजर आए और पूरी संगीत नगरी शिवमय वातावरण में लीन दिखाई दी। कथा के दौरान उन्होंने शिवमहापुराण में वर्णित विभिन्न प्रसंगों का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को धर्म, भक्ति, संस्कार और मानव जीवन के मूल्यों का संदेश दिया।
कथावाचक ने रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करते हुए बताया कि रुद्राक्ष भगवान शिव की कृपा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। वीरभद्र उत्पत्ति प्रसंग में राजा दक्ष के अहंकार और भगवान शिव के अपमान का उल्लेख करते हुए बताया गया कि अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बनता है। सती जन्म एवं शिव-सती विवाह प्रसंग में त्याग, प्रेम और समर्पण की भावना को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया।
माता पार्वती जन्म एवं शिव-पार्वती विवाह की कथा में तप, विश्वास और अटूट भक्ति का महत्व बताया गया। गणेश जन्म प्रसंग में माता पार्वती द्वारा भगवान गणेश की उत्पत्ति और भगवान शिव द्वारा उन्हें प्रथम पूज्य देव बनाने की कथा सुनाई गई। वहीं गणेश विवाह प्रसंग में पारिवारिक मूल्यों और मंगल परंपराओं का महत्व समझाया गया।
कथा के दौरान कार्तिकेय जन्म एवं तारकासुर वध का प्रसंग श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र रहा। कथावाचक ने बताया कि देवताओं को तारकासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने अवतार लिया और धर्म की रक्षा के लिए तारकासुर का वध किया। इस प्रसंग के माध्यम से धर्म की विजय और अधर्म के अंत का संदेश दिया गया।
इसके अलावा विष्णु-तुलसी विवाह एवं शिव दशावतार का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया। कथावाचक ने बताया कि भगवान शिव समय-समय पर विभिन्न रूपों में प्रकट होकर सृष्टि के संतुलन और धर्म की रक्षा करते हैं। कथा के दौरान श्रद्धालु भावविभोर होकर शिवभक्ति में लीन नजर आए।
समापन दिवस पर सुबह वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन पूजन एवं शिव रुद्राभिषेक सम्पन्न हुआ। इसके बाद शाम को आयोजक श्रीवास्तव परिवार द्वारा श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी का वितरण किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने प्रसाद ग्रहण कर धर्म लाभ लिया।
इस धार्मिक आयोजन के मुख्य यजमान साकेत श्रीवास्तव एवं समृद्धि श्रीवास्तव रहे। आयोजन को सफल बनाने में विमल कुमार श्रीवास्तव, अन्नपूर्णा श्रीवास्तव, राजेश श्रीवास्तव व हर्षा श्रीवास्तव सहित श्रीवास्तव परिवार एवं नगरवासियों का विशेष सहयोग रहा।

