खैरागढ़. एशिया के पहले संगीत एवं कला विश्वविद्यालय के रूप में पहचान रखने वाले राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय ने अपनी गौरवशाली यात्रा के 70 वर्ष पूरे कर लिए। मंगलवार को आयोजित स्थापना दिवस समारोह में शास्त्रीय संगीत, नृत्य और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन पर जोर दिया गया। राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय के कुलाधिपति रमेन डेका ने प्रदेश की समृद्ध लोककलाओं को डिजिटल माध्यमों से वैश्विक पहचान दिलाने की आवश्यकता बताई, वहीं सांसद संतोष पांडेय ने विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए राजमहल दान करने वाले राजपरिवार के योगदान को ऐतिहासिक बताया।


विश्वविद्यालय के परिसर क्रमांक-2 स्थित डॉ. नरेन्द्र देव वर्मा प्रेक्षागृह में आयोजित समारोह में राज्यपाल रमेन डेका मुख्य अतिथि तथा सांसद संतोष पांडेय विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा के संरक्षण में आयोजित कार्यक्रम में राजपरिवार की सदस्य राजकुमारी शताक्षी सिंह सहित जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, प्राध्यापक, कर्मचारी, विद्यार्थी और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।


कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, राज्यगीत और विश्वविद्यालय गीत से हुई। इसके बाद अतिथियों ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर समारोह का शुभारंभ किया तथा राजकुमारी इंदिरा सिंह के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राजेंद्र ने किया। अंत में प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुड़े ने आभार व्यक्त किया।
राजमहल दान से रखी गई कला-संगीत की ऐतिहासिक नींव
विश्वविद्यालय की स्थापना की कहानी त्याग, दूरदर्शिता और कला के प्रति समर्पण की मिसाल है। 14 अक्टूबर 1956 को तत्कालीन खैरागढ़ रियासत के राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती सिंह ने अपनी पुत्री राजकुमारी इंदिरा सिंह की स्मृति में अपना राजमहल संगीत एवं कला शिक्षा के लिए दान कर दिया था। इसी ऐतिहासिक पहल से संस्थान की नींव पड़ी और खैरागढ़ को कला-संगीत के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान मिली।

सांसद संतोष पांडेय ने कहा कि राजपरिवार ने अपनी संपत्ति को निजी सीमाओं तक रखने के बजाय आने वाली पीढ़ियों की शिक्षा और कला-साधना के लिए समर्पित किया। आज के दौर में दो डिसमिल जमीन दान करने के लिए भी लोग कई बार सोचते हैं, जबकि राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह और रानी पद्मावती सिंह ने अपना राजमहल दान कर दिया। यह उनकी उदारता और दूरदर्शी सोच का परिचायक है। उन्होंने कहा कि देश-विदेश से विद्यार्थी यहां अध्ययन करने आते हैं और इस संस्थान ने खैरागढ़ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। उन्होंने संस्थापक राजपरिवार के प्रति नमन व्यक्त करते हुए इस विरासत को गौरव का विषय बताया। अपने संबोधन में उन्होंने शिक्षा, कला-कौशल, परिश्रम और राष्ट्रीयता की भावना को मजबूत करने का संदेश भी दिया।
लोककलाओं को मोबाइल और इंटरनेट के जरिए दुनिया तक पहुंचाएं : राज्यपाल
राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि खैरागढ़ कला की भूमि है और विश्वविद्यालय का सात दशक की यात्रा पूरी करना बड़ी उपलब्धि है। इसके पीछे विद्यार्थियों, शिक्षकों, कर्मचारियों और संस्थान से जुड़े सभी लोगों का सामूहिक योगदान है। उन्होंने संगीत को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि यह मनुष्य को मानसिक शांति देने के साथ विभिन्न परिस्थितियों में संबल भी प्रदान करता है। नृत्य, चित्रकला और शिल्प किसी समाज के इतिहास और सांस्कृतिक जीवन को अभिव्यक्त करते हैं।

उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की वास्तविक सांस्कृतिक विरासत आज भी ग्रामीण अंचलों में जीवंत है, जबकि शहरों में कला और संस्कृति के प्रति पारंपरिक जुड़ाव कमजोर पड़ रहा है। प्रदेश की पंडवानी, पंथी, राउत नाचा, सुवा नृत्य, कर्मा और बस्तर की जनजातीय नृत्य परंपराओं को मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाया जाना चाहिए। राज्यपाल ने विद्यार्थियों से प्रतिभा के साथ धैर्य, निरंतर अभ्यास और समर्पण बनाए रखने का आह्वान किया। उन्होंने कला को आजीविका और व्यवसाय से जोड़ने की संभावनाओं पर भी जोर दिया।
राज्यपाल ने विश्वविद्यालय में आर्किटेक्चर की पढ़ाई शुरू करने की इच्छा भी जताई, जिससे संस्थान में अध्ययन के नए अवसर विकसित किए जा सकें।
कुलपति ने बताईं उपलब्धियां, शिक्षकों और भवनों की कमी का उठाया मुद्दा
कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने स्वागत उद्बोधन में विश्वविद्यालय की सात दशक लंबी विकास यात्रा और कला शिक्षा में योगदान का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यहां से प्रशिक्षित कलाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया है। विश्वविद्यालय के विद्यार्थी केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और एकलव्य विद्यालयों सहित प्रतिष्ठित संस्थानों में कला शिक्षा के क्षेत्र में सेवाएं दे रहे हैं।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में देश के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, श्रीलंका और वियतनाम के विद्यार्थी एवं शोधार्थी भी अध्ययन कर रहे हैं। संस्थान को पहली बार भारतीय विश्वविद्यालय संघ से महिला यूथ पार्लियामेंट के आयोजन की स्वीकृति मिली है, जिसका आयोजन जनवरी में प्रस्तावित है।
कुलपति ने उपलब्धियों के साथ संस्थान की व्यावहारिक चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने शिक्षकों, संगत कलाकारों और कर्मचारियों की कमी तथा अतिरिक्त भवनों की आवश्यकता बताते हुए शासन से सहयोग की अपेक्षा की, ताकि शैक्षणिक गतिविधियों का विस्तार और बेहतर ढंग से किया जा सके।
स्कूल स्तर पर कला शिक्षा मजबूत करने का सुझाव
समारोह के दौरान लोक साहित्य और लोकसंगीत को शास्त्रीय कला शिक्षा के साथ जोड़ने की आवश्यकता भी उठाई गई। मंच संचालन से जुड़े डॉ. राजन यादव ने सुझाव दिया कि प्रदेश के प्रत्येक जिले के दस हायर सेकेंडरी स्कूलों में ललित कलाओं के शिक्षक नियुक्त किए जाएं। इससे ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को गायन, वादन, नृत्य और लोकसंगीत का प्रशिक्षण स्थानीय स्तर पर मिल सकेगा। उन्होंने कहा कि स्कूल स्तर पर कला शिक्षा की बेहतर व्यवस्था होने से विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय तक पहुंचने से पहले ही अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर मिलेगा।
सितार, कथक और पंथी नृत्य ने बांधा समां
स्थापना दिवस की सांस्कृतिक संध्या में मुंबई के डॉ. जुनैन हलीम जाफर खान के सितार वादन, इंदौर की डॉ. सुचित्रा हरमलकर की कथक प्रस्तुति तथा पद्मश्री डॉ. राधेश्याम बारले एवं उनके समूह के पंथी नृत्य ने समारोह को विशेष बना दिया। सितार के शास्त्रीय सुरों, कथक की भावपूर्ण अभिव्यक्ति और पंथी नृत्य की पारंपरिक थाप ने भारतीय शास्त्रीय कला और छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को एक मंच पर प्रस्तुत किया।

सात दशक की इस यात्रा ने एक बार फिर रेखांकित किया कि खैरागढ़ का संगीत विश्वविद्यालय केवल उच्च शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि कला परंपराओं के संरक्षण, नई प्रतिभाओं के निर्माण और छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान को व्यापक मंच देने वाली महत्वपूर्ण संस्था है।


