खैरागढ़, साकेत श्रीवास्तव. गर्मी ने अभी ठीक से दस्तक भी नहीं दी है और खैरागढ़ के कई वार्डों में पेयजल की किल्लत ने विकराल रूप धारण कर लिया है। विडंबना यह है कि तीन नदियों (आमनेर, मुस्का और पिपरिया) के संगम पर बसे इस शहर के बाशिंदे आज पानी के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। सरकारी तंत्र की लापरवाही और राजनीतिक खींचतान के बीच वार्ड नंबर 4, गंजीपारा के रहवासी पिछले एक महीने से गंभीर जल संकट झेल रहे हैं।
वार्डवासियों का आक्रोश: "समय पर भरते हैं टैक्स, फिर क्यों झेलें प्यास?"

गंजीपारा के निवासियों का कहना है कि वे नगर पालिका के नियमों का पालन करते हुए समय पर जल कर (वाटर टैक्स) का भुगतान कर रहे हैं, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ खाली बर्तन और आश्वासन मिल रहे हैं। वार्डवासियों ने नाराजगी जताते हुए कहा:

"हमारे घरों में सरकारी नल लगे हैं, हम नियमित रूप से टैक्स जमा करते हैं, इसके बावजूद हमें बूंद-बूंद पानी के लिए तरसना पड़ रहा है। जब प्रशासन पैसा वसूलने में पीछे नहीं रहता, तो सुविधाएं देने में यह कोताही क्यों?"
गंजीपारा: सरकारी नल सूखे, हैंडपंप के भरोसे ग्रामीण


वार्ड नंबर 4 के निवासियों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले निजी कनेक्शनों में पानी आना बंद हुआ, जिसके बाद सार्वजनिक नलों से उम्मीद थी, लेकिन पिछले एक माह से वे भी सूखे पड़े हैं। अब हालत यह है कि लोगों को तपती धूप में दूर-दराज के हैंडपंपों या अन्य निजी साधनों से पानी ढोकर लाना पड़ रहा है।

वार्ड पार्षद सुमित टांडिया ने नगर पालिका प्रशासन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उन्होंने जल विभाग के अधिकारी मनोज शुक्ला को कई बार स्थिति से अवगत कराया, लेकिन अधिकारियों के 'टाल-मटोल' रवैये के कारण वार्डवासी प्यासे हैं। हालांकि, मुख्य नगर पालिका अधिकारी पुनीत राम वर्मा ने दावा किया है कि उन्होंने स्वयं वार्ड का दौरा किया है और अगले दो से तीन दिनों के भीतर समस्या का समाधान कर लिया जाएगा।
करोड़ों खर्च, फिर भी 'पुरानी पद्धति' का सहारा

शहर की प्यास बुझाने के दावों की पोल 2015-16 की 'जल आवर्धन योजना' खोल रही है। भाजपा शासनकाल में स्वीकृत इस 37 करोड़ रुपये की योजना का उद्देश्य शहर को व्यवस्थित पाइपलाइन से जोड़ना था। लेकिन सत्ता परिवर्तन के साथ ही योजना की दिशा भी बदल गई।
मूल योजना: छिंदारी बांध से पानी लाना प्रस्तावित था।
संशोधित योजना: कांग्रेस सरकार के दौरान 2 करोड़ की लागत से लालपुर एनीकट की ऊंचाई बढ़ाकर पानी स्टोर करने की योजना बनी।
नतीजा: यह प्रयोग पूरी तरह विफल रहा। टेस्टिंग के दौरान घरों में गंदा पानी पहुंचा, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हुईं और भारी विरोध के बाद इसे बंद करना पड़ा।
आज स्थिति यह है कि करोड़ों की पाइपलाइन बिछने के बाद भी नगर पालिका वापस 'पुरानी पद्धति' (बोरवेल के जरिए टंकियां भरकर सप्लाई) पर लौट आई है।
नदियों का सूखता अस्तित्व और प्रशासनिक मौन

खैरागढ़ की जीवनदायिनी मानी जाने वाली नदियाँ—आमनेर, मुस्का और पिपरिया—आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं। कभी साल भर लबालब रहने वाली ये नदियाँ अब केवल मानसून तक सीमित रह गई हैं। रेत के अवैध उत्खनन और जल संरक्षण की ठोस नीति न होने के कारण ये नदियाँ सूख चुकी हैं। स्थानीय प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर पर्यावरणीय संकट पर मूकदर्शक बने हुए हैं।
सियासी दांव-पेंच में पिसी जनता
पेयजल संकट अब पूरी तरह से राजनीतिक फुटबॉल बन चुका है। भाजपा और कांग्रेस एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार और विफलता के आरोप लगा रहे हैं, लेकिन धरातल पर किसी के पास समाधान नहीं है। राजनीतिक मंचों और चुनावी वादों में गूंजने वाली 'नगर हित' की बातें प्यासे कंठों तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
"नगर पालिका के अधिकारी सिर्फ आश्वासन देते हैं। हम एक महीने से पानी ढो रहे हैं। हमारी समस्या का स्थायी समाधान कब होगा, कोई नहीं जानता।"
— वार्डवासी, गंजीपारा



