खैरागढ़. देश-प्रदेश में कला और संगीत शिक्षा की विशिष्ट पहचान रखने वाले इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन प्रस्ताव को राज्य शासन से औपचारिक स्वीकृति मिल गई है। लंबे समय से चली आ रही प्रशासनिक और वैधानिक प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद अब विश्वविद्यालय का नया नाम “राजकुमारी इन्दिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय” किए जाने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। शासन की मंजूरी के साथ ही विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पहचान को नए स्वरूप में संरक्षित करने की दिशा में इसे महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार यह पहल माननीय राज्यपाल एवं कुलाधिपति महोदय के सुझाव और मार्गदर्शन में आगे बढ़ाई गई। इसके बाद कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा के नेतृत्व में विश्वविद्यालय प्रशासन ने नियमानुसार सभी आवश्यक प्रक्रियाएं पूरी करते हुए नाम परिवर्तन का प्रस्ताव शासन को भेजा था। शासन स्तर पर दस्तावेजों की जांच, परीक्षण और प्रशासनिक विचार-विमर्श के बाद प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान कर दी गई।
राज्यपाल के सुझाव से शुरू हुई प्रक्रिया
जानकारी के अनुसार माननीय राज्यपाल एवं कुलाधिपति महोदय ने विश्वविद्यालय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और संस्थापक राजपरिवार के योगदान को अधिक सम्मानजनक रूप से संरक्षित करने की आवश्यकता जताई थी। उन्होंने विश्वविद्यालय की मूल सांस्कृतिक पहचान को नई पीढ़ी तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के उद्देश्य से नाम परिवर्तन का सुझाव दिया था। इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजा।
प्रक्रिया के दौरान शासन ने नाम परिवर्तन से जुड़े आवश्यक दस्तावेजों की मांग की थी, जो विश्वविद्यालय स्तर पर तत्काल उपलब्ध नहीं थे। बताया गया कि कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा के विशेष प्रयासों से आवश्यक दस्तावेज जुटाए गए और शासन को उपलब्ध कराए गए। इसके बाद छत्तीसगढ़ सामान्य प्रशासन विभाग के अवर सचिव द्वारा गुरुवार 21 मई को राज्यपाल के नाम से जारी पत्र में विश्वविद्यालय के नाम परिवर्तन की स्वीकृति प्रदान की गई।
राजपरिवार की विरासत को मिलेगा स्थायी सम्मान
विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि यह निर्णय केवल नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि खैरागढ़ राजपरिवार की दानशीलता, कला संरक्षण और शिक्षा के क्षेत्र में उनके ऐतिहासिक योगदान को स्थायी सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। खैरागढ़ राजपरिवार ने कला एवं संगीत शिक्षा को बढ़ावा देने में जो भूमिका निभाई, उसे नई पीढ़ी तक प्रभावी रूप से पहुंचाने की भावना इस निर्णय के केंद्र में रही।
उल्लेखनीय है कि खैरागढ़ स्थित यह विश्वविद्यालय लंबे समय से देश के प्रतिष्ठित कला एवं संगीत शिक्षण संस्थानों में गिना जाता रहा है। यहां से बड़ी संख्या में कलाकार, संगीतज्ञ और सांस्कृतिक प्रतिभाएं निकलकर राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना चुकी हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय की मूल ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के उद्देश्य से लिया गया यह निर्णय दूरगामी महत्व का माना जा रहा है।
कुलपति ने जताई प्रसन्नता
कुलपति प्रो. (डॉ.) लवली शर्मा ने शासन की स्वीकृति पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की गौरवशाली परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और संस्थापक परिवार के योगदान को यह निर्णय स्थायी सम्मान प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय कला और संगीत शिक्षा की अपनी समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाते हुए नई पीढ़ी को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ने का कार्य निरंतर करता रहेगा।


