धमतरी/रायपुर. छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का छोटा सा गांव बिरेतरा इन दिनों पूरे प्रदेश में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। वजह है—बोर्ड परीक्षा 2026 से पहले गांव द्वारा अपनाया गया ‘स्टडी कर्फ्यू’, जिसे ग्रामीण “भविष्य बचाओ अभियान” के रूप में देख रहे हैं। यह पहल केवल परीक्षा परिणाम सुधारने का प्रयास नहीं, बल्कि सामाजिक अनुशासन और नशा मुक्ति की दिशा में एक ठोस कदम मानी जा रही है।

सामूहिक सहमति से लिया गया ऐतिहासिक फैसला
शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल बिरेतरा में आयोजित ग्रामसभा और सामूहिक बैठक में शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति, महिला समूहों, युवाओं और वरिष्ठ ग्रामीणों ने शिक्षा की गिरती गुणवत्ता पर गंभीर चर्चा की। बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि शाम 6 बजे के बाद कोई भी स्कूली छात्र गांव की सड़कों, चौक-चौराहों, दुकानों, खेल मैदानों या चौपालों पर नहीं दिखेगा।
नियम तोड़ने पर केवल छात्र ही नहीं, उसके अभिभावकों को भी जिम्मेदार माना जाएगा और आर्थिक दंड लगाया जाएगा।
क्यों जरूरी समझा गया ‘स्टडी कर्फ्यू’?
ग्रामीणों का कहना है कि हाल के वर्षों में मोबाइल फोन की बढ़ती लत, देर रात तक बाहर घूमने की आदत,और नशे की बढ़ती प्रवृत्ति ने बच्चों की पढ़ाई को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। इसी को देखते हुए यह तय किया गया कि यदि गांव स्तर पर अनुशासन लागू किया जाए, तो बोर्ड परीक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
तय किए गए स्पष्ट शैक्षणिक लक्ष्य
बैठक में परीक्षा परिणाम को लेकर ठोस लक्ष्य भी निर्धारित किए गए—
कक्षा 10वीं में कम से कम 80% पास प्रतिशत
कक्षा 12वीं में 100% परिणाम
ग्रामीणों का विश्वास है कि नियमित अध्ययन समय और सामूहिक निगरानी से ये लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
केवल कर्फ्यू नहीं, व्यापक सामाजिक अनुशासन
बिरेतरा में लागू नियम एक व्यापक सामाजिक व्यवस्था का हिस्सा हैं—
1. शाम 6 बजे के बाद अध्ययन समय
छात्रों का सार्वजनिक स्थानों पर दिखना प्रतिबंधित।
खेल, घूमना-फिरना और अनावश्यक बाहर बैठने पर रोक।
2. मोबाइल और टीवी पर नियंत्रण
पढ़ाई के समय मोबाइल फोन का उपयोग वर्जित।
परीक्षा अवधि तक टीवी देखने पर सख्ती।
3. अभिभावकों की जवाबदेही
पालकों को बच्चों की पढ़ाई और होमवर्क की नियमित निगरानी करनी होगी।
लापरवाही पर अभिभावकों पर भी जुर्माना।
4. नशा मुक्ति पर कड़ा रुख
शराब, धूम्रपान और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन व बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध।
उल्लंघन पर 5,000 से 50,000 रुपये तक जुर्माना, कुछ मामलों में इससे अधिक दंड का प्रावधान।
5. अनुशासनहीनता पर कार्रवाई
गाली-गलौज, आपसी विवाद और असामाजिक व्यवहार पर भी दंड तय।
शाम ढलते ही बदल गया गांव का माहौल
नियम लागू होने के बाद बिरेतरा की शामें पूरी तरह बदल चुकी हैं। जहां पहले गलियों और चौपालों में युवाओं की भीड़ नजर आती थी, अब वहां शांति है।
एक ग्रामीण महिला कहती हैं,
“अब बच्चे घर में बैठकर पढ़ाई करते हैं, माहौल पहले से ज्यादा सकारात्मक हो गया है।”
एक शिक्षक का कहना है,
“यह सिर्फ परीक्षा की बात नहीं, बच्चों के पूरे भविष्य का सवाल है।”
निगरानी के लिए वार्ड समितियां सक्रिय
गांव में वार्ड निगरानी समितियों का गठन किया गया है, जो सुबह और शाम बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखती हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यदि कोई बच्चा बाहर दिखता है, तो पड़ोसी भी उसे टोककर पढ़ाई के लिए घर भेज देते हैं।
विशेषज्ञों की राय: अनुशासन के साथ संतुलन जरूरी
शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि बोर्ड परीक्षा से पहले नियमित अध्ययन समय तय करना लाभकारी है, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि बच्चों पर मानसिक दबाव न बढ़े। बिरेतरा की खासियत यह है कि यह पहल सामूहिक सहमति से लागू की गई है, जिससे इसे सामाजिक सहयोग का प्रभावी मॉडल माना जा रहा है।
नशा मुक्त गांव की दिशा में कदम
ग्रामीणों का कहना है कि यह अभियान केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं है। पढ़ाई का माहौल और नशा मुक्ति मिलकर भविष्य में अपराध और सामाजिक समस्याओं को भी कम करेंगे।
क्या बनेगा बिरेतरा प्रदेश के लिए मॉडल?
अब सबकी नजरें बोर्ड परीक्षा 2026 के परिणाम पर टिकी हैं। यदि लक्ष्य हासिल होते हैं, तो बिरेतरा का ‘स्टडी कर्फ्यू’ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि देश के अन्य ग्रामीण इलाकों के लिए भी प्रेरक मॉडल बन सकता है।
बिरेतरा ने साफ संदेश दिया है—
“सिर्फ सरकार नहीं, समाज भी चाहे तो शिक्षा में क्रांति ला सकता है।”


