खैरागढ़. केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना, जिसका संकल्प साल 2024 तक देश के हर ग्रामीण घर में 'नल से जल' पहुंचाना था, छत्तीसगढ़ के नवगठित जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (KCG) के वनांचल क्षेत्रों में प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। विडंबना देखिए कि जहां सरकार आदिवासियों और राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों (विशेष पिछड़ी जनजाति) के उत्थान के दावे करती है, वहीं साल्हेवारा वनांचल के ग्रामीण आज भी पीने के पानी की एक-एक बूंद के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

शोपीस बनी संरचनाएं: टंकी है, पाइप है, पर पानी नदारद

साल्हेवारा क्षेत्र के ग्राम पंचायत समुन्दपानी की तस्वीर इस योजना की विफलता की जीती-जागती कहानी कह रही है। यहां तीन साल पहले ही पानी की टंकी का निर्माण हो चुका है, गांव की गलियों में पाइप लाइन बिछाई जा चुकी है और घरों के बाहर नल भी लगा दिए गए हैं। लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी ग्रामीणों के नलों से पानी की एक बूंद भी नहीं टपकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि नल-जल योजना के नाम पर केवल ढांचा खड़ा किया गया है। वर्तमान स्थिति यह है कि टंकी तो भरती है, लेकिन वह घरों तक पहुंचने के बजाय वहीं ओवरफ्लो होकर बर्बाद हो रही है। ग्रामीण आज भी पुराने हैंडपंपों और कुओं के भरोसे हैं, जो बढ़ती गर्मी के साथ जवाब देने लगे हैं।
"पाइप बिछी है, पर जुड़ाव गायब": अधिकारी का रटा-रटाया तर्क

लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHE) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मामले में विभाग के एसडीओ दिनेश सिंह का कहना है कि:
"पाइप लाइन बिछी हुई है, लेकिन उसे मुख्य टंकी से जोड़ने का कार्य वनांचल के कई गांवों में अभी शेष है। इसे जल्द ही पूरा कर लिया जाएगा।"
सवाल यह उठता है कि क्या विभाग तीन साल से केवल जोड़ने (Connectivity) का इंतजार कर रहा था? क्या ठेकेदारों को भुगतान कार्य पूर्ण होने के दावों पर कर दिया गया? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका जवाब साल्हेवारा के प्यासे ग्रामीण ढूंढ रहे हैं।
गर्मी की आहट और बढ़ती मुश्किलें
ग्राम पंचायत सचिव मुंशी श्रीवास के मुताबिक, शुरुआत में कुछ घरों में पानी आया था, लेकिन तकनीकी खामियों के कारण वह जल्द ही बंद हो गया। इसकी सूचना कई बार PHE विभाग को दी गई, अधिकारी जांच के नाम पर खानापूर्ति कर लौट गए, लेकिन समाधान 'शून्य' रहा।
ग्रामीणों की व्यथा:
हैंडपंपों पर निर्भरता: भू-जल स्तर गिरने से हैंडपंप हवा उगलने लगे हैं।
पलायन की नौबत: गर्मी बढ़ने पर ग्रामीणों को पानी के लिए दूसरे गांवों या कोसों दूर स्थित झिरिया (छोटे जल स्रोत) पर निर्भर होना पड़ता है।
पैसे की बर्बादी: सरकारी खजाने से लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता को लाभ नहीं मिलना सीधे तौर पर 'काम चलाऊ' रवैए को दर्शाता है।
कब जागेगा प्रशासन?
जल जीवन मिशन का उद्देश्य केवल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना नहीं, बल्कि सेवा सुनिश्चित करना है। यदि गर्मी के चरम पर पहुंचने से पहले विभाग ने समुन्दपानी और आसपास के वनांचल गांवों में नल-जल योजना को सुचारू नहीं किया, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता होगी, बल्कि मानवीय संकट को भी निमंत्रण देगा।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और विभाग के आला अधिकारी इस 'सूखे' सिस्टम में कब तक प्राण फूंक पाते हैं, ताकि वनांचल के अंतिम व्यक्ति तक स्वच्छ पेयजल पहुंच सके।


