रायपुर. छत्तीसगढ़ में स्थानीय स्वशासन की पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की दिशा में राज्य सरकार ने एक अहम निर्णय लिया है। अब महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पति, पुत्र या अन्य रिश्तेदार लायजन पर्सन अथवा अनौपचारिक प्रतिनिधि के रूप में कार्य नहीं कर सकेंगे। नगरीय प्रशासन विभाग ने इस तरह की सभी नियुक्तियों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
सरकार ने राज्य के सभी नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों से यह निर्देशित किया है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में रिश्तेदारों को प्रतिनिधि के रूप में नामित किए जाने का पूरा विवरण निर्धारित समय-सीमा में प्रस्तुत करें। विभाग का कहना है कि महिला आरक्षण की भावना को कमजोर करने वाली किसी भी व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
इस निर्णय की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वह टिप्पणी भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिसमें प्रॉक्सी प्रतिनिधित्व को संविधान के समानता और लोकतांत्रिक सहभागिता के सिद्धांतों के विपरीत बताया गया था। आयोग ने स्पष्ट किया था कि निर्वाचित महिला प्रतिनिधि की जगह किसी अन्य व्यक्ति का निर्णय लेना न केवल अधिकारों का हनन है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा पर भी आघात है।
नगरीय प्रशासन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, यह सख्ती केवल स्थानीय निकायों तक सीमित नहीं रहेगी। सांसदों और विधायकों के प्रतिनिधियों की नियुक्ति प्रक्रिया पर भी निगरानी बढ़ाई जाएगी, ताकि शासन-प्रशासन में जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
राज्य सरकार का मानना है कि इस फैसले से महिला जनप्रतिनिधियों की वास्तविक भागीदारी बढ़ेगी और निर्णय प्रक्रिया में उनकी स्वतंत्र भूमिका सशक्त होगी। यह आदेश पूरे प्रदेश में समान रूप से लागू होगा और उल्लंघन की स्थिति में कठोर कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

