खबरों का प्रहरी न्यूज. शासकीय अस्पतालों में कवरेज पर रोक: पत्रकारों के अधिकारों का हनन?
00 छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले पर उठे सवाल, मीडिया संगठनों में रोष
खैरागढ़/छत्तीसगढ़. छत्तीसगढ़ सरकार ने हाल ही में एक ऐसा निर्णय लिया है, जिसने राज्यभर के पत्रकारों और मीडिया संस्थानों में गहरी चिंता पैदा कर दी है। अब से शासकीय अस्पतालों में पत्रकारों द्वारा किसी भी प्रकार की खबरों की कवरेज पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा जारी निर्देश के अनुसार, पत्रकार बिना प्रशासन की अनुमति के अस्पताल परिसरों में प्रवेश कर रिपोर्टिंग नहीं कर सकेंगे।
इस फैसले के खिलाफ पत्रकार संघों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पैरोकारों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका मानना है कि यह निर्णय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला है और यह जनता को सच जानने के अधिकार से वंचित करने की कोशिश है।
"अगर पत्रकार अस्पतालों की बदहाल स्थिति या मरीजों की समस्याओं को उजागर नहीं करेंगे, तो जवाबदेही कौन तय करेगा?"
— छत्तीसगढ़ प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने बयान में कहा।
प्रशासन का पक्ष:
स्वास्थ्य विभाग का तर्क है कि पत्रकारों की आवाजाही से अस्पतालों की नियमित व्यवस्था बाधित होती है और मरीजों की गोपनीयता भंग होती है। विभाग का कहना है कि यह कदम अस्पतालों में अनुशासन और शांति बनाए रखने के लिए उठाया गया है।
विरोध की लहर:
- सोशल मीडिया पर पत्रकारों ने विरोध शुरू कर दिया है, हैशटैग #पत्रकार_का_हक_छीनना_बंद_करो ट्रेंड कर रहा है।
- कई मीडिया संस्थानों ने इसे प्रेस की स्वतंत्रता पर "अघोषित सेंसरशिप" बताया है।
- मानवाधिकार संगठनों ने भी इस पर चिंता जताई है, और इसे सूचना के अधिकार का उल्लंघन बताया है।
सवाल उठते हैं:
- क्या यह आदेश आम लोगों की आवाज को दबाने की रणनीति है?
- क्या इससे अस्पतालों में होने वाली अनियमितताओं पर पर्दा नहीं डाला जा रहा?
- क्या यह संविधान द्वारा प्रदत्त स्वतंत्र प्रेस के अधिकारों का हनन नहीं है?
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार इस विरोध के बीच अपने फैसले पर पुनर्विचार करती है या नहीं।




