खैरागढ़/नई दिल्ली. विद्यालयी शिक्षा में हस्तकला कौशल एवं देश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को शिक्षण-अधिगम प्रक्रिया से जोड़ने के उद्देश्य से सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, सेक्टर-07, द्वारका, नई दिल्ली में दस दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। 8 से 17 सितंबर 2026 तक आयोजित इस कार्यशाला में देश के 11 राज्यों के 66 शिक्षकों ने सक्रिय सहभागिता की।

कार्यशाला का उद्देश्य शिक्षकों को हस्तकला कौशल के साथ देश की सांस्कृतिक विविधता, लोक परंपराओं, कला, हस्तशिल्प, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, स्थापत्य और विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना तथा इन्हें विद्यालयीन शिक्षण प्रक्रिया से जोड़ने के लिए आवश्यक व्यवहारिक प्रशिक्षण देना रहा।
कार्यशाला में हस्तकला, शिल्पकला, पेंटिंग, मुखौटा निर्माण, बुक बाइंडिंग, पेपर मेसिंग और कागज से विभिन्न कलाकृतियां बनाने जैसी गतिविधियां कराई गईं। इसके अलावा व्याख्यान, समूह चर्चा, व्यावहारिक गतिविधियों, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों एवं विभिन्न शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से प्रतिभागियों ने विषय की व्यवहारिक समझ विकसित की।
राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की प्रस्तुति
कार्यशाला में छत्तीसगढ़ की लोक कला एवं संस्कृति की विशेष प्रस्तुति भी दी गई। प्रदेश की समृद्ध लोक परंपराओं, लोकगीतों, लोकनृत्यों, पारंपरिक कला और सांस्कृतिक विरासत को देश के विभिन्न राज्यों से आए शिक्षकों के समक्ष प्रस्तुत किया गया। छत्तीसगढ़ की सहज, जीवंत और लोकजीवन से जुड़ी सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों ने कार्यशाला में विशेष आकर्षण पैदा किया।
छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक प्रस्तुति में प्रदेश के विभिन्न जिलों से आए शिक्षकों ने सहभागिता की। इनमें भूषण लाल वर्मा (खैरागढ़), मनोज वर्मा (बेमेतरा), पुराणिक जगत (गरियाबंद), मालती नेताम (कांकेर), किरण शर्मा (दुर्ग), राजेश्वरी निराला (सूरजपुर), काजल सिंह (कोरिया), रामनाथ सोनकर (बिलासपुर) एवं संतोष प्रजापति (जीपीएम) शामिल रहे।
प्रतिभागी शिक्षकों ने छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की विविध विधाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हुए प्रदेश की लोक परंपरा, कला, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक जीवन की विशेषताओं से अन्य राज्यों के शिक्षकों को परिचित कराया। इससे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान और विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर साझा करने का महत्वपूर्ण अवसर मिला।
कार्यशाला के दौरान विभिन्न राज्यों के शिक्षकों ने भी अपनी-अपनी क्षेत्रीय संस्कृति और लोक परंपराओं का आदान-प्रदान किया। इस सांस्कृतिक संवाद से ‘विविधता में एकता’ की भारतीय भावना को मजबूती मिली और प्रतिभागियों को देश की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अवसर प्राप्त हुआ।
कार्यशाला ने शिक्षकों को यह समझने का अवसर भी दिया कि लोक कला और संस्कृति केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति, परंपरा, पहचान और मूल्यबोध की महत्वपूर्ण धरोहर है। विद्यालयों के माध्यम से इस विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में शिक्षक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।


