खैरागढ़. जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के गंभीर आरोपों ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है। विभाग के ही एक सेवानिवृत्त सहायक वर्ग-03 कर्मचारी, शिवशंकर उपाध्याय द्वारा लगाए गए 500 करोड़ रुपये के भ्रष्टाचार के आरोपों पर अब विभाग ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। कार्यपालन अभियंता (EE) ने इन आरोपों को न केवल निराधार बताया है, बल्कि शिकायतकर्ता पर ही छवि धूमिल करने की साजिश रचने का पलटवार किया है।
आरोपों की झड़ी: मुख्यमंत्री तक पहुंची शिकायत

बीती 25 फरवरी 2026 को सेवानिवृत्त कर्मचारी शिवशंकर उपाध्याय ने मुख्यमंत्री के नाम एक लिखित ज्ञापन सौंपकर विभाग के आला अधिकारियों और कर्मचारियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप जड़े थे। उपाध्याय की मांग है कि पूरे मामले की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए।
शिकायत के मुख्य बिंदु:
500 करोड़ का भ्रष्टाचार: उपाध्याय का आरोप है कि कार्यपालन अभियंता बी.के. मरकाम, सहायक अभियंता केतन किशोर साहू, अविनाश नायक और अन्य कर्मचारियों ने मिलकर विभिन्न विकास कार्यों में लगभग 500 करोड़ रुपये की अनियमितता की है।
रिश्वत की मांग: आरोप है कि सहायक मानचित्रकार कमल नारायण ठाकुर द्वारा लंबित ग्रेच्युटी भुगतान के बदले 55,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई।
लॉगबुक में फर्जीवाड़ा: कार्यपालन अभियंता पर वाहन लॉगबुक में फर्जी एंट्री कर शासकीय धन के दुरुपयोग का भी आरोप लगाया गया है।
विभाग का पलटवार: "आरोप निराधार, साक्ष्य कुछ और ही कहते हैं"
शिकायत के बाद मचे बवाल पर जल संसाधन विभाग के कार्यपालन अभियंता (EE) बी.के. मरकाम ने विस्तृत स्पष्टीकरण जारी किया है। मरकाम के अनुसार, शिवशंकर उपाध्याय द्वारा लगाए गए सभी आरोप तथ्यों से परे और दुर्भावनापूर्ण हैं।
विभाग द्वारा प्रस्तुत तर्क:

ग्रेच्युटी का भुगतान: मरकाम ने स्पष्ट किया कि उपाध्याय का यह दावा गलत है कि उन्हें अब तक ग्रेच्युटी नहीं मिली है। विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, उनकी ग्रेच्युटी 7 सितंबर 2021 को ही जारी की जा चुकी है। जब भुगतान वर्षों पहले हो चुका है, तो उसके लिए रिश्वत मांगने का सवाल ही पैदा नहीं होता।


हस्ताक्षरों में भिन्नता: विभाग ने एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि उपाध्याय द्वारा अलग-अलग आवेदनों में किए गए हस्ताक्षर (Signatures) एक-दूसरे से मेल नहीं खाते, जो पूरे मामले को संदेहास्पद बनाता है।
छवि धूमिल करने की साजिश: EE मरकाम का कहना है कि यह विभाग और शासन की छवि को खराब करने की एक सोची-समझी साजिश है।

"शिवशंकर उपाध्याय द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे हैं। विभाग की छवि को नुकसान पहुँचाने के इस प्रयास की विभागीय जांच के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा। जो भी दोषी पाया जाएगा, उस पर कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।"
— बी.के. मरकाम, कार्यपालन अभियंता
जांच के घेरे में 'दावे' और 'नीयत'
वर्तमान में शासन ने इन आरोपों पर जांच के आदेश दे दिए हैं। मामला अब पेचीदा हो गया है—क्या वाकई 500 करोड़ के विकास कार्यों में कोई बड़ी सेंधमारी हुई है, या फिर यह एक सेवानिवृत्त कर्मचारी की विभाग को फंसाने की निजी खुन्नस है?
विशेषज्ञों का मानना है कि हस्ताक्षर में भिन्नता और ग्रेच्युटी भुगतान की तारीखें इस केस में निर्णायक साबित होंगी। फिलहाल, विभाग में मचे इस 'हड़कंप' का पटाक्षेप जांच रिपोर्ट आने के बाद ही होगा।


