खैरागढ़. छत्तीसगढ़ के नवगठित जिला खैरागढ़-छुईखदान-गंडई में भ्रष्टाचार का एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है। खैरागढ़ नगरपालिका में विवाह प्रमाण-पत्र (Marriage Certificate) जारी करने के नाम पर बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। प्रारंभिक जांच के आंकड़ों ने प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया है—जहां शहर में वास्तविक रूप से 50-60 शादियां हुईं, वहीं कागजों पर महज साढ़े तीन महीने के भीतर 2,744 प्रमाण-पत्र जारी कर दिए गए।

निलंबन काल में 'सक्रिय' रही सीएमओ की आईडी
इस पूरे घोटाले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि ये प्रमाण-पत्र तत्कालीन सीएमओ के निलंबन अवधि के दौरान जारी किए गए। नियमों के मुताबिक, निलंबन के बाद संबंधित अधिकारी की डिजिटल आईडी और डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) को तत्काल फ्रीज या बंद कर दिया जाना चाहिए था। लेकिन, खैरागढ़ में निलंबित अधिकारी कोमल ठाकुर की आईडी का धड़ल्ले से उपयोग होता रहा। ठाकुर ने इस मामले में अनभिज्ञता जाहिर की है, जिससे आईडी के अनाधिकृत उपयोग और मिलीभगत की आशंका गहरा गई है।
दूसरे जिलों के आवेदकों पर मेहरबानी
नगरपालिका का क्षेत्राधिकार केवल उसके 20 वार्डों तक सीमित होता है। बावजूद इसके, खैरागढ़ से जांजगीर-चांपा, धमतरी और बीजापुर जैसे सुदूर जिलों के आवेदकों को भी प्रमाण-पत्र बांटे गए। सूत्रों का दावा है कि बाहरी जिलों के आवेदनों को बिना किसी भौतिक सत्यापन के स्वीकृत किया गया और इसके बदले आवेदकों से हजारों रुपए की अवैध वसूली की गई।
राजस्व को भी लगाया लाखों का चूना
जांच में यह भी तथ्य सामने आया है कि बड़ी संख्या में जारी किए गए इन प्रमाण-पत्रों के लिए अनिवार्य 'चालान राशि' (₹500) भी सरकारी खजाने में जमा नहीं की गई।
वेरिफायर की संदिग्ध भूमिका: राजस्व निरीक्षक राजेश तिवारी, जिनकी आईडी से इन आवेदनों का सत्यापन (Verification) हुआ, वे भी वर्तमान में निलंबित हैं और खुद को निर्दोष बता रहे हैं। सवाल यह उठता है कि यदि अधिकारी निलंबित थे, तो उनकी आईडी से पोर्टल पर लॉगिन कर सत्यापन कौन कर रहा था?
"क्षेत्राधिकार से बाहर के विवाह प्रमाण-पत्र जारी करना एक गंभीर अपराध है। इस मामले में संलिप्त किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा। कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।"
— गिरजा चंद्राकर, अध्यक्ष, नगरपालिका परिषद खैरागढ़
चिप्स और एनआईसी की मदद से खंगाला जा रहा डेटा

मामले की गंभीरता को देखते हुए नगरीय प्रशासन विभाग के दुर्ग संभाग के संयुक्त संचालक ने जांच के आदेश दे दिए हैं। वर्तमान सीएमओ पुनीत वर्मा को बुधवार को तलब कर सभी दस्तावेज पेश करने को कहा गया।
तकनीकी जांच: चूंकि मामला डिजिटल धोखाधड़ी से जुड़ा है, इसलिए एनआईसी (NIC) और चिप्स (CHiPS) की मदद से वास्तविक डेटा निकाला जा रहा है ताकि यह पता चल सके कि किस आईपी एड्रेस से और किस समय ये सर्टिफिकेट जेनरेट किए गए।
फिलहाल, नगरपालिका कार्यालय में फाइलों की धूल झाड़ी जा रही है और छुट्टी के दिनों में भी अधिकारी डेटा जुटाने में लगे हैं। जिला निर्माण के बाद इसे इलाके का सबसे बड़ा प्रशासनिक घोटाला माना जा रहा है, जिसकी आंच कई बड़े चेहरों तक पहुंच सकती है।


